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मनुष्य जीवन का मकसद क्या है

                          मनुष्य जीवन का मकसद क्या है

 


 

हम में से किसी को भी नहीं पता कि मनुष्य जन्म का असल मकसद क्या है हम लोग सोचते हैं कि हमने इस दुनिया में रहना है यहां के साजो समान धन पदार्थ . यह सब ही हमारा मकसद है इन्हें हासिल कर लेना ही हमारी कामयाबी है. जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है हमारे जीवन का मकसद कुछ और है जिसे हम आज तक समझ ही नहीं पाए.


   *परमात्मा ने हमें "नर नारायणी देह" बख्सी है "अशरफ उल मख़लूक़ात" बनाया है यहाँ तक "टॉप ऑफ क्रिएशन्स" कहा है परन्तु हम अपनी ही ताकत से अनजान बन कहाँ उलझ गऐ अपने आप से बेख़बर हाथ फ़ैलाएं घूम रहें हैं*

 *अपने ही घर में पराए बने बैठे हैं*

     *इस को एक कहानी के द्वारा समझते हैं*

*एक बार की बात है कुछ धनवान लोग एक संत के पास जाया करते थे। परन्तु वहाँ जाकर भी उस संत से सांसारिक वस्तुएं ही मांगा करते थे। वे संत जो भी बोल देते थे, वह पूरा हो जाता था। वे लोग बहुत प्रसन्न होते परन्तु उनका माँगना समाप्त नहीं हुआ*। 

                          *एक दिन संत जी ने विचार किया कि ये लोग सांसारिक पदार्थो को एकत्रित करने में अपना जीवन नष्ट कर रहे हैं, अब इनको कुछ समझाना चाहिए।* 

                    *एक दिन संत जी ने उनको कहा कि आप मेरे पास आते हैं और मेरे कहने से परमात्मा आपके कार्य पूर्ण कर देता है। आप लोग प्रभु से सीधी बात क्यों नहीं कर लेते? उन्होने कहा कि महाराज, हमें कैसे पता परमात्मा से कैसे बात करनी हैं संत ने कहा कि वह मै सिखा दूँगा। सभी बहुत प्रसन्न हुए कि अब हमारा कार्य और भी आसान हो जाएगा। संत ने कहा कि प्रातः जल्दी आना। वे सभी लोग दूसरे दिन प्रातः संत के पास पहुंच गये।  संत ने कहा कि आँखे बंद करके बैठ जाओ। परमात्मा से प्रार्थना करनी हैं। जैसे मैं बोलूँगा, ठीक उसी तरह मेरे पीछे- पीछे बोलना है*। 

    ..महात्मा जी ने बोलना प्रारम्भ कर दिया- *हे प्रभु! आप अन्तर्यामी हैं। आप कृपा करके हमारी समस्याओं को समाप्त कर दो। हे ईश्वर! आप तो भली- भाँति जानते हैं कि हमें कितनी चिंतायें हैं। कभी इन्कम टैक्स की चिंता तो कभी सेल टैक्स की। सभी लोग संत के पीछे- पीछे बोलते जा रहे थे। संत ने आगे कहा कि हे परमात्मा! आप कृपा करके हमें कभी भी यह मनुष्य शरीर मत देना बल्कि हमें कुते, बिल्ली, गधे इत्यादि योनियों में भेज देना। हमें कीड़े मकौड़े बना देना, हमें पेड़ बनाकर ऊगा देना, हमें पानी के जीव जन्तु बना देना|*

       *यह सुनते ही सभी ने चौंक कर आँखे खोली और कहने लगे- महाराज! यह आप क्या कह रहे हैं ? संत ने कहा कि आप केवल भोग ही तो भोगना चाहते हैं और ये भोग तो आप चौरासी लाख योनियों में भी भोग सकते हैं।*

      *उन योनियों में आपको किसी भी प्रकार की कोई चिंता नहीं सताएगी।*

        *सभी लोग संत के चरणो में गिर पड़े और कहने लगे कि महाराज, हम रास्ता भटक गये थे। आप कृपा करके हमें सत्य की जानकारी दे, जिससे हमारा कल्याण हो। तब संत ने उन्हें मनुष्य जन्म का उदेश्य समझाया ही नही बलिक अपने आप को पहचानने का रास्ता भी दिखाया।* 

          फिर संत बोले- *मनुष्य शरीर प्रभु से नश्वर वस्तुओं को माँगने के लिए नहीं अपितु प्रभु से प्रेम करने के लिए मिला है।*      *इसलिए मनुष्य तन प्राप्त करके भी हम मालिक के बिना जो कुछ भी माँगेगे बह ही दुख का कारण बन जाएगा गुरु घर :-

 *बिन तुध होर जे मंगना*

        *सिर दुखां के दुख*

फ़िर माँगे भी क्योँ क्योंकि हमारी आवश्यकताओं के अनुसार तो उसने हमें पहले ही दिया हुआ है।

गुरू घर की बानी 

 *सैल पत्थर महि जंत उपाए*

*तांका रिझक* 

      *आगै करि धरिया*

 *जब सभी जीवों के खाने का पत्थरों के जीवों की बह सम्भाल कर रहा है तो हम जीव उस से उस के बिना माँग कर उसके परवदगार होने की ताकत को छोटा नहीँ बना रहे*

      *मालिक ने हमें बिबेक दीआ है कि बापस हम अपने खोए अस्तुत्व को बापिस प्राप्त कर लें*

       *जीवन हमारा है और निर्णय भी हमारे को ही तो लेना है......*.

       *यहाँ या बहाँ*

     *अपना घर या पराया घर*

       *और कोई जगह नही*

*और यह भी जीतै जी मरने के बाद ना तो कोई यह पूछेगा कि हम कहाँ से आऐ*

     *ना ही हमारे लिऐ कोई हमारे पीछै हमारे लिए कुछ कर पायेगा कितने भी हमारे नाम पर दूसरा तीसरा दसवाँ या बाहरवाँ करदे हमें कुछ नही मिल पाएगा*

  *हमारे किए कर्म ही हमारे साथ जाएँगे*

*जीते जी हमारे सामने दोनों विकल्प खुले हैं मालिक की शरण में चले जाना ,मालिक से मिलाप कर लेना या वापिस 84 में आकर विलाप*

         आख़िर

   *फ़ैसला हमारे हाथ में

इंसान अगर अपने आप में कुछ ठान लेता है तो वह उसे प्राप्त करके ही रहता है इसलिए अब हमारे हाथ में फैसला यह है कि हम चाहे तो 84 चुन ले चाहे हम इस आवागमन के चक्कर से हमेशा के लिए आजाद हो जाए अब यह निर्णय हमने लेना है.


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 धन्यवाद

  

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