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क्या हम सबको चुनौतियों का सामना करना पड़ता है

   क्या हम सबको चुनौतियों का सामना करना पड़ता है

 


 

हां हमें जीवन में सबको चुनौतियों का सामना करना पड़ता है इस संसार में ऐसा कोई भी इंसान नहीं है जिसे कभी चुनौतियों का सामना ना करना पड़े. संसार में कदम कदम पर चुनौतियां मिलती है और इन चुनौतियों को पार करना ही जीवन का असल मकसद बन चुका है.

आज हम किसी से भी पूछे तो वह बताएगा कि मेरी जीवन में यह वाली चुनौती है जिसे मैंने पार करना है बड़ी से बड़ी चुनौतियां भी होती है जीवन में. दरअसल यह सब चुनौतियां हमें जीने का सही मकसद समझाती है सही तरीका बताते हैं कि किस तरह से हमने अपने जीवन को व्यतीत करना है.


हमें इन चुनौतियों का हंसते हुए सामना करना चाहिए और हंसते-हंसते चुनौतियों से निकल जाना चाहिए क्योंकि इस दुनिया में कोई भी ऐसी चुनौती नहीं है जो कभी किसी के जीवन में ना आए हो कोई नई चुनौती तो हमारे सामने आई नहीं है. हम दूसरों के जीवन में देखे तो सब इन चुनौतियों से ही न गुजरे है यहां तक की अवतारों को भी इन चुनौतियों से निकलना पड़ा है. मैं आपको एक छोटी सी कहानी के जरिए बताती हूं.


महाभारत में कर्ण ने श्री कृष्ण से पूछा "मेरी माँ ने मुझे जन्मते ही त्याग दिया, क्या ये मेरा अपराध था कि मेरा जन्म एक अवैध बच्चे के रूप में हुआ?


दोर्णाचार्य ने मुझे शिक्षा देने से मना कर दिया क्योंकि वो मुझे क्षत्रीय नही मानते थे, क्या ये मेरा कसूर था?


परशुराम जी ने मुझे शिक्षा दी साथ ये शाप भी दिया कि मैं अपनी विद्या भूल जाऊंगा क्योंकि वो मुझे क्षत्रीय समझते थे।


भूलवश एक गौ मेरे तीर के रास्ते मे आकर मर गयी और मुझे गौ वध का शाप मिला?


द्रौपदी के स्वयंवर में मुझे अपमानित किया गया, क्योंकि मुझे किसी राजघराने का कुलीन व्यक्ति नही समझा गया।


यहां तक कि मेरी माता कुंती ने भी मुझे अपना पुत्र होने का सच अपने दूसरे पुत्रों की रक्षा के लिए स्वीकारा।


मुझे जो कुछ मिला दुर्योधन की दया स्वरूप मिला!


तो क्या ये गलत है कि मैं दुर्योधन के प्रति अपनी वफादारी रखता हूँ..??


श्री कृष्ण मंद मंद मुस्कुराते हुए बोले-


"कर्ण, मेरा जन्म जेल में हुआ था। मेरे पैदा होने से पहले मेरी मृत्यु मेरा इंतज़ार कर रही थी। जिस रात मेरा जन्म हुआ उसी रात मुझे मेरे माता-पिता से अलग होना पड़ा। तुम्हारा बचपन रथों की धमक, घोड़ों की हिनहिनाहट और तीर कमानों के साये में गुज़रा।


मैने गायों को चराया और गोबर को उठाया।


जब मैं चल भी नही पाता था तो मेरे ऊपर प्राणघातक हमले हुए।


कोई सेना नही, कोई शिक्षा नही, कोई गुरुकुल नही, कोई महल नही, मेरे मामा ने मुझे अपना सबसे बड़ा शत्रु समझा।


जब तुम सब अपनी वीरता के लिए अपने गुरु व समाज से प्रशंसा पाते थे उस समय मेरे पास शिक्षा भी नही थी। बड़े होने पर मुझे ऋषि सांदीपनि के आश्रम में जाने का अवसर मिला।


तुम्हे अपनी पसंद की लड़की से विवाह का अवसर मिला मुझे तो वो भी नही मिली जो मेरी आत्मा में बसती थी।


मुझे बहुत से विवाह राजनैतिक कारणों से या उन स्त्रियों से करने पड़े जिन्हें मैंने राक्षसों से छुड़ाया था!


जरासंध के प्रकोप के कारण मुझे अपने परिवार को यमुना से ले जाकर सुदूर प्रान्त मे समुद्र के किनारे बसाना पड़ा। दुनिया ने मुझे कायर कहा।


यदि दुर्योधन युद्ध जीत जाता है तो विजय का श्रेय तुम्हे भी मिलेगा, लेकिन धर्मराज के युद्ध जीतने का श्रेय अर्जुन को मिलेगा! कौरव अपनी हार का उत्तरदायी मुझे समझेंगें।


हे कर्ण ! किसी का भी जीवन चुनोतियों से रहित नही है। सबके जीवन मे सब कुछ ठीक नही होता। कुछ कमियां अगर दुर्योधन में थी तो कुछ युधिष्टर में भी थीं।


सत्य क्या है और उचित क्या है? ये हम अपनी आत्मा की आवाज़ से स्वयं निर्धारित करते हैं!


इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारे साथ अन्याय होता है, 


इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारा अपमान होता है, 


इस बात से कोई फर्क नही पड़ता कितनी बार हमारे अधिकारों का हनन होता है।


फ़र्क़ सिर्फ इस बात से पड़ता है कि हम उन सबका सामना किस प्रकार करते हैं..!!


सामना तो हमें हर हाल में करना होगा वह चाहे हंसकर करें चाहे दुखी होकर. फैसला भी हमने करना होगा. कि हम इन चुनौतियों से कैसे लड़ते हैं और कैसे अपने जीवन में आगे बढ़ते हैं.


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 धन्यवाद

    

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